बुड्ढे का वफादार कुत्ता।

 यह कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है, कोरोना का समय चल रहा था।

 महेंद्र सिंह एक बहुत अमीर व्यक्ति हैं जिनकी उम्र 55 साल है, जो रानीपुर नामक गांव में रहते हैं। उनके परिवार में 4 सदस्य हैं उनकी पत्नी का नाम सती देवी तथा उनके पुत्र का नाम  राजेंद्र सिंह है उनकी पत्नी की उम्र  50 साल है  तथा उनकी बहू का नाम सीमा सिंह है।


 अमीर होने के कारण उनका परिवार बहुत ही खुशहाल जिंदगी बिता रहा था।


 वैसे तो खुशहाल जिंदगी बिताने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं होती है,लेकिन हां पैसा एक बहुत ही आवश्यक  वस्तु है,और उनके पास पैसा की तो अधिकता थी ही।
 पुराने जमाने के होने के कारण उनके हिस्से में 200 बीघा जमीन आती थी तथा गांव में उनकी बहुत ही पुरानी हवेली भी थी । उनके पास बहुत सारी कारें थी बहुत नौकर चाकर दरवाजे पर ही घूमते रहते थे।

  -महेंद्र सिंह एक बहुत ही सुलझे हुए व्यक्ति थे जिस कारण गांव की जनता उन्हें बहुत ही पसंद करती थी. और वह पिछले 20 वर्षों से गांव के प्रधान भी थे।

 एक दिन शाम का वक्त है, सुंदर सुहावनी ठंडी हवा बह रही  है ,दरवाजे की चौखट पर कुर्सी डालें उनका पुत्र सुरेंद्र सिंह बैठा चाय पी रहा है।अंदर  मां बैठी  टीवी देख रही है और  बहू नौकर के साथ बाहर खरीदारी करने गई है। महेंद्र सिंह अपने कमरे में हैं ।

कि अचानक महेंद्र सिंह के  खांसने की आवाज आती है यहां तक तो कोई बात नहीं थी सब कुछ सामान्य चल रहा था कि अचानक महेंद्र सिंह को कुछ ज्यादा खांसी महसूस होती है ,वह वहां से आवाज लगा देते हैं। कि कोई है क्या कोई उन्हें एक गिलास पानी नहीं दे सकता।जब उनकी पत्नी को उनकी आवाज सुनाई देती है तब उन्हें थोड़ा सा अंदाजा होता है कि समस्या थोड़ी गंभीर है।
 तो वह नौकर से कहती हैं पानी ले जाने के लिए जब वहां नौकर पानी लेकर जाता है अरे यह क्या महेंद्र सिंह जमीन पर पड़े हुए हैं और अपने सीने को दोनों हाथों से दवाये हुए हैं।
उसके हाथ से पानी की गिलास छूट पड़ता है वह बहुत तेज चिल्लाता है आवाज सुनकर सारे घर वाले वहां पर इकट्ठे हो जाते हैं और उनका पुत्र उन्हें आनन-फानन में गाड़ी से अस्पताल में ले जाता है वहां पर उस समय कोरोना का समय चलने के कारण  उन्हें कहीं पर डॉक्टर कोई भी भर्ती नहीं करता है बहुत ही मुश्किल से एक जगह पर उनको  भर्ती किया जाता है और जब चेकअप करा जाता है उनका। तो पता चलता है कि उन्हें को रोना हो गया है जब उनके परिवार के सदस्यों को यह पता चलता है।
 तो सब के डर के मारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं और साथ ही साथ सब लोग बहुत चिंतित होते हैं और लेकिन कोई भी व्यक्ति उनके साथ नहीं रहना चाहता है ।सारे व्यक्ति उनसे पीछा छुड़ाना चाहते हैं ।कोई नहीं चाहता कि उसे करोना हो जाए सारे उनके घरवाले उनसे ऐसे दूर भागते हैं जैसे कि वह न जाने कब से नहीं जानते। महेंद्र सिंह का कोई है ही नहीं। खैर अभी 14 दिन के लिए महेंद्र सिंह को क्वॉरेंटाइन में ही रहना है। सारे परिवार के सदस्य घर वापस लौट आते हैं ।




जब महेंद्र सिंह अस्पताल में रह रहे होते हैं तो कोई भी व्यक्ति दिन से एक भी बार मिलने नहीं जाता है। कोई भी व्यक्ति उनका खाने पीने का सामान लेकर अस्पताल में नहीं जाता है सारे व्यक्ति कटने से लगते हैं इस केवल एक ही कारण होता है  कोरोना।

 धीरे-धीरे महेंद्र सिंह को भी इन बातों का आभास होता है कि उनके परिवार के सदस्य उनसे दूरियां बनाने लगे हैं। उन्हें बहुत दुख होता है बात यहां तक बढ़ जाती है कि,

 जब उन्हें 14 दिन के बाद क्वॉरेंटाइन से मुक्त किया जाता है तो उन्हें कोई उनके परिवार का सदस्य लेने तक नहीं आता है लेकिन जब वह बाहर निकलते हैं तब वह देखते हैं कि बाहर एक कुत्ता बैठा हुआ है अरे यह तो डायमंड है यह डायमंड कोई ऐसा वैसा कुत्ता नहीं यह उनका पालतू कुत्ता है।जो उन्होंने उसके बचपन में उसे एक दुकान से खरीदा था बहुत ही प्यार से पाला था महेंद्र सिंह ने इस कुत्ते को।
  वहां पर एक व्यक्ति जो की बहुत ही आनंद से पान चबा  रहा होता है उस कुत्ते को और महेंद्र सिंह को वहां पर देखकर महेंद्र सिंह से पूछता है महाशय क्या यह कुत्ता आपका है महेंद्र सिंह के कुछ बोलने से पहले ही वह फिर बोलता है यह पिछले 14 दिनों से यहीं पर रहता है इसे खाने के लिए कोई कुछ डाल देता है तो यह खा लेता है नहीं तो यह भूखा 14 दिनों से यहीं पर रहता है जबकि यहां पर तो करो ना के इतने सारे मरीज हैं ।


यह बात सुनते ही महेंद्र सिंह की आंखों में आंसू आ जाते हैं ,इतना सब होने के बावजूद भी उनके परिवार वालों क्या उनके साथ ऐसा व्यवहार करने के बाद भी वह सोचते हैं कि शायद कुछ उन लोगों की मजबूरी रही होगी।
 ऐसा सोच कर वह अपने घर की ओर चल देते हैं और वह घर पर पहुंचते हैं  लेकिन जैसे ही वह घर के अंदर कदम रखने वाले होते हैं कि उन्हें कुछ लोगों की बातचीत करने  की आवाज सुनाई देती है उनके परिवार के सारे सदस्य आपस में इसी बात पर झगड़ रहे होते हैं। कि  उनके घर पर आने से कहीं उन लोगों की जान खतरे में ना आ जाए ।



पुत्र अपनी मां से कहता है वह तो आपके पति हैं आपको उनके साथ कहीं दूसरे किराए के मकान लेकर वहां पर शिफ्ट हो जाना चाहिए और आपको उनकी देखभाल करनी चाहिए। जब तक कि यह करोना की वैक्सीन नहीं आ जाती है या फिर इस समस्या का कोई  निवारण नहीं हो जाता है इस प्रकार सारे लोग एक दूसरे के ऊपर जिम्मेदारी डालने में लगे हुए थे सब सोच रहे थे कैसे उनको घर से दूर रखा जाए।


 यह सब बातें सुनते ही महेंद्र सिंह रोने लगे और सारे परिवार वालों से  आकर बोले मैं ही खुद यहां से चला जाता हूं तुम लोगों को मुझे कहीं भेजने  की जरूरत नहीं है और इतना कहकर वह अपने पालतू कुत्ते डायमंड को साथ लेकर वहां से चल  दिए।

 डायमंड जो कि एक पशु था उस समय महेंद्र सिंह को अपने परिवार में पलने वाले उन पशुओं से बेहतर लगा।
वहां से निकलकर महेंद्र सिंह सीधे बैंक में पहुंचे और उन्होंने निर्णय किया कि उनके मरने के बाद उनकी सारी धन दौलत जमीन पैसा डायमंड के नाम हो जाएगा। 


 वह अपनी बाकी की जिंदगी भगवान की सेवा में साधु वेश में गुजारेंगे तथा उन्होंने अपनी इस दशा के लिए भगवान को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया कि भगवान ने समय रहते उनकी आंखें खोल दी जिस परिवार के लिए उन्होंने सब कुछ किया अपनी पूरी जिंदगी मेहनत की आज उस परिवार ने ही उन्हें  छोड़ दिया।






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