सब कुछ ठीक कैसे हो ?

 


प्राचीन काल में जब सभ्यता संस्कृति समाज का इतना विकास नहीं हुआ था तब तक तो यह बात समझ में आती थी कि इंसान एक जानवर है ।

 हालांकि इंसान भी एक महत्वकांक्षी जानवर है यह बात तो अब भीसही है।

 लेकिन इंसान पूर्ण रूप से जानवर है यह कहना अतिशयोक्ति होगी क्योंकि इंसान जानवरों से कुछ क्षेत्रों में भिन्न है ।


़़़़़़़़़लेकिन आजकल के समय में तो इंसान ने जानवरों को पीछे कर रखा वह इंसान तो कहीं से नहीं लग रहा है उल्टा जानवरों से भी गया गुजरा हो गया है ।


           तो आज इसी बात पर चर्चा होगी कि इंसान कैसे बने ? तो मैं बताने जा रहा हूं आज के युग में क्या हो रहा है आज की युग में पैसे को बहुत ज्यादा प्राथमिकता दे दी गई है जिसके पास पर इतना ज्यादा पैसा है वह उतना ज्यादा अमीर है पैसे से प्रत्येक चीज खरीदी जा सकती है जिसके पास जितना ज्यादा पैसा है वह उतना ज्यादा संस्कारी है उसकी उतनी ज्यादा समाज में इज्जत है लोग उसकी उतनी ज्यादा समाज में प्रतिष्ठा देते हैं चाहे वह पूर्ण रुप से निरा जानवर ही क्यों ना हो।

 बच्चा पैदा होता है तब तो समझ में आता है कि वह एक जानवर है क्योंकि उस समय तो उसके पास ना ही अपनी कोई समझ होती है लेकिन ना ही ना ही कोई विचार होते हैं जो कि उसके अपने स्वतंत्र कोई विचार होते हैं जो कि जानवरों और इंसानों में सामान है उस समय तक ठीक है।  लेकिन इसके पश्चात जब आप और थोड़े बड़े होते हैं तो आपके पास अच्छा खासा समय होता है कि आप अपने आप को इंसान बनाए। लेकिन हम करते क्या हैं कि बड़े होते हैं अपने चौतरफा विकास करते हैं हम पढ़ाई लिखाई करते हैं पैसा भरना शुरू करते हैं और व्यवसाय विकास करते हैं।

 लेकिन इंसानियत का विकास नहीं कर पाते हैं ,मैं यह नहीं कहता  की  पढ़ाई लिखाई मत करो, पैसा पैदा मत करो, शरीर का  ध्यान मत रखो यह सब चीजें आवश्यक है और उतनी ही आवश्यक है जितना कि भोजन करना।कैसा लगेगा अगर मैं कहूं कि आप पूरे दिन भोजन करते रहो ठीक वैसे ही यह सब क्रियाएं हैं  जिस प्रकार हम केवल 15 मिनट में भोजन करके पूरे दिन काम चलाते हैं ।


उसी प्रकार यह सब  क्रियाएं केवल जीवन का एक अंग है जीवन तो नहीं लेकिन  इन सब से ज्यादा जरूरी है कि इंसान बनो, इन सब के बाद भी  रहोगे तो  जानवर के जानवर ही। सोचो कितना अजीब लगेगा कि  गधा कपड़े पहन कर पहन रहा है वही गधा पैसे कमा रहा है वह बड़े-बड़े विदेशों में कॉलेजों में जाकर पढ़ाई कर रहा है और बहुत सी डिग्री हासिल कर रहा है लेकिन क्या फायदा अरे भाई रहा तो  गधे का गधा ही।

 बिल्कुल यही हाल आजकल के इंसानों का है कि सब कुछ तो कर रहे हैं लेकिन जो सबसे जरूरी है वही काम नहीं कर रहे हैं कि इंसान बनना ।



बहुत से व्यक्ति जानवर बने बने ही अपनी पूरी जिंदगी काट देते हैं और अपने आने वाली संतानों को भी यही शिक्षा देते हैं कि बेटा जानवर बने रहना इंसान बनने में कोई भलाई नहीं है।  बे भी बिचारे क्या करें उन्हें खुद ही नहीं पता है कि वह जानवर बने हुए हैं आज के जमाने के इंसान के समय में दया, धर्म, इज्जत ,मान सम्मान नाम की कोई चीज रही नहीं गई है उसे तो केवल एक ही चीज दिखाई देती है कि अपना स्वार्थ सिद्ध करना और हो जाए उसके शरीर की भूख और चाहे उसकी मन की भूख जिसके लिए वह पूरी प्रकृति का नाश करने में लगा हुआ है उसे अच्छे बुरे का कोई भेद ही नहीं है जो चीज उसके मन में आती है करता रहता है।

     रेप,चोरी ,डकैती, लूट, हत्या यह सब जानवर होने की ही तो पहचान है सभी के पीछे का मुख्य कारण यही है कि वह यह सब करके सुख पाना चाहता है। लेकिन शायद उसे यह पता ही नहीं है कि सुख इस संसार में है ही नहीं और वह इस संसार में पाना चाहता है जिसके लिए वह सब कुछ सर्वस्व नाश करे दे रहा है।

 अरे भाई  आपको यह तो पता होना चाहिए कि वह जो चीज चाहता है वह चीज उसको मिलेगी कहां।लेकिन उसने यह मानसिकता बना रखी है कि उसे जो चीज चाहिए वह उसे इस संसार में ही मिलेगी क्योंकि इसके बाहर सोचने के लिए उसे बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी उसे अपना सोचने का नजरिया बदलना पड़ेगा जो कि बहुत कठिन है एक व्यक्ति की अंगूठी खो गई है और उसने यह धारणा बना ली है कि उसकी अब अंगूठी पास की एक बगीचे में खोई हुई है   इसके लिए सबसे पहले तो वह बगीचे को खोदना शुरू करता है लेकिन उसे फिर भी अंगूठी नहीं मिलती है परंतु उसने यह धारणा है इतनी बुरी तरह से अपने हृदय में बसा दी है की अंगूठी है तो बगीचे में ही इसके लिए उसे बगीचे में कुछ जानवर मिलते हैं जीव मिलते हैं सबसे पहले उसे बगीचे में खरगोश मिलता है उसे लगता है कि शायद खरगोश ने शायद अंगूठी को खा लिया होगा और वह खरगोश को फाड़ डालता है खरगोशों को और अन्य सभी जानवरों को इस वजह से मार डालता है कि उसे लगता है कि अंगूठी शायद में जानवरों में कहीं उनके पेट में होगी तो इस तरह से नाश करने लगता है पूरा  बगीचा उजाड़ देता है एक बार भी यह नहीं सोच सकता की अंगूठी कहीं बगीचे के बाहर भी हो सकती है लेकिन यह सब सोचने के लिए अगर उसने एक बार यह सोच भी लिया की अंगूठी बगीचे के बाहर हो सकती है तो उसको बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी क्योंकि बगीचा तो छोटा सा है उसमें तो वह ढूंढ सकता है लेकिन बगीचे के बाहर फिर तो अंगूठी कहीं भी हो सकती है।


 चाहे उसे बगीचे के बाहर आसानी से बाहर निकलते ही अंगूठी मिल जाए लेकिन वह इस भय से बगीचे के बाहर अंगूठी नहीं ढूंढता है कि उसके लिए तो उसे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी बिल्कुल यही दशा आज के युग में मानव की हुई पड़ी है वह इस दुनिया में सुख ढूंढ है इस पृथ्वी पर सुकून ढूंढना चाहता है  और अपने सुख की प्राप्ति के लिए उसने पृथ्वी के सभी चीजों का सर्वनाश कर दिया है।

 वन  जंगल ,जीव जंतु वायु सब कुछ नष्ट कर दिया है विषैले कर दिए हैं बर्बाद कर दिए हैं केवल अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए लेकिन वास्तविकता तो यह है कि सुकून शांति प्रकृति में है ही नहीं इसके लिए आपको कुछ प्रकृत से बाहर प्रकृत से ऊंचा सोचना होगा यह तो सब कुछ माया है जिस इसमें अगर आप सुख शांति की तलाश करोगे तो आप उसमें और गहरे फंसते चले जाओगे लेकिन आपको सुख शांति नहीं मिलेगी।

 धन्यवाद 

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