क्या इस तारीफ की कीमत तुम जानती हो?


 

ज्यादातर लड़कियों में एक आदत बहुत ही सामान्य सी होती है कि उन्हें अपनी तारीफ सुनना बहुत पसंद होता है, उन्हें सजना सवरना बहुत पसंद होता है ।
सारी लड़कियों की बात नहीं कर रहा है मैं ज्यादातर लड़कियों की बात कर रहा हूं और उसमें भारत में तो कहना ही क्या।
 इसका कारण यह नहीं है कि लड़कियों को हमेशा से ही तारीफ सुनने की आदत थी या भगवान ने ही उन्हें इस लायक बनाया है कि उनकी जरा सी तारीफ कर दो तो भी बहुत खुश हो जाती हैं, लेकिन मैंने जितना अपने अनुभव से सीखा है वह सब तो इसी बात की ओर इशारा करती है कि लड़की चाहे कितनी भी सामान्य परिवार से हो या कितने भी अमीर परिवार से हो तारीफ सुनना हर लड़की की कमजोरी होती है वो जरा सी बात पर विचलित हो जाती है और बहुत ही ज्यादा इमोशनल भी होती हैं कई लड़कियां।
वास्तव में हुआ क्या है कि लड़कियों के साथ बहुत ही पुराने समय से नाइंसाफी हो रही है,उन्हें धीरे-धीरे इस बात का विश्वास दिलाया गया है कि उनका काम केवल सजने संवरने का,घर की चार दीवारों में रहने का,  बच्चा पैदा करने का है तो यह बात ज्यादातर लड़कियों के अंदर तक बस चुकी है कि उनका मात्र इतना ही काम है।
 अभी भी बहुत से क्षेत्रों में ऐसे ही लड़कियां भी रहती है कि  उनकी पूरी जिंदगी हो जाती है गुजर जाती है और वह शायद ही अपने क्षेत्र से दूर कभी ही घूमने या फिर किसी कार्य के लिए जाती है अर्थात वह अपनी पूरी जिंदगी को एक छोटे से मकान में रहकर ही गुजार देती हैं और उन्हें साथ ही साथ इस बात का भी विश्वास दिला दिया गया है कि अगर कोई लड़की ऐसा करती है तो वह बहुत ही सम्मानित है। उसको यह सब करके ही सम्मान मिलेगा।
    अगर आपको मेरी इस बात का विश्वास नहीं होता है तो मैं आपको एक ऐसा उदाहरण दूंगा कि पूर्ण रुप से विश्वास हो जाएगा आपको ।
पिछले 100 सालों का इतिहास उठाकर देख लीजिए पुरुषों ने इतने बड़े-बड़े काम किए हैं,
 पुरुषों ने बहुत सारे काम किए हैं।
 विज्ञान के क्षेत्र में,
चिकित्सा के क्षेत्र में,
 राजनीति के क्षेत्र में,
औद्योगिक क्षेत्र में,
 और विभिन्न क्षेत्र में पुरुषों ने अपना बहुत नाम किया है लेकिन स्त्रियों ने भी बहुत नाम किया है लेकिन  इनकी संख्या देंखेंगे तो पुरुषों की अपेक्षा बहुत ही कम और ना के बराबर है।
 इतना तो आप जानते ही होंगे कि भगवान ने जब स्त्री और पुरुष की रचना की थी तो उसने कोई भेद नहीं किया था उसने स्त्री को पुरुष से किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं बनाया था हर क्षेत्र में स्त्री पुरुष के बराबर या उससे आगे ही थी।
 हां अगर शारीरिक ताकत की बात देखें तो उसमें तो भले ही पुरुष स्त्री से थोड़ा ज्यादा होता है बाकी  में तो स्त्री और पुरुष में कोई भेदभाव नहीं किया था लेकिन और अगर देखा जाए तो शारीरिक ताकत के बदले स्त्री पुरुष से तीन चार वर्ष अधिक ही जीती है।
अर्थात भगवान ने उसको शारीरिक ताकत के बदले यह उपहार दिया है और कई प्राकृतिक क्षेत्रों में तो  स्त्री पुरुषों से आगे ही होती है।
फिर कहां गई स्त्री की यह ऊर्जा?
 कहाँ गया स्त्री जाति का पूरा श्रम?
 बच्चे पैदा करने और घर के कामकाज देखने में ही बर्बाद हो गया।
 वास्तव में यह पुरुषों की एक मिलीभगत है जिससे कि स्त्री को आगे बढ़ने से रोक सकें और यह चीज स्त्री के दिमाग में और मन में पूरी तरह से बैठ चुकी है और वह कर भी क्या सकती है अगर वह सब के खिलाफ आवाज उठाती है ।तो उसको बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  ऐसा बिल्कुल नहीं है कि यह समस्याएं गरीब लोगों में है या फिर गरीब लोगों की स्त्री लड़कियां ही बंदी हैं।यह समस्या अमीर लोगों में और भी ज्यादा तेजी से प्रचलित है वह अमीर अवश्य है ,उसका घर बहुत बड़ा है, कमरे में ए सी है,महंगे कपड़े पहनने को मिलते हैं, अच्छा खाना खाने को मिलता है ,आभूषण पहनने को मिलते हैं ,लेकिन इस सब की कीमत उसे और ज्यादा बंदी होकर चुकानी पड़ती है अर्थात जो लड़की जितनी ज्यादा अमीरी में रहती है वह उतनी ज्यादा बंधी रहती है। हां ठीक है विवाह के पहले थोड़ा कम  विवाह के बाद पूर्ण रूप से। 
 मेरा यहां पर यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि अगर आपने अपनी लड़की को शिक्षित कर दिया है या पढ़ा लिखा दिया है तो उसको बंधन से मुक्त कर दिया है क्योंकि आज के जमाने में पढ़ाई लिखाई तो बहुत जोरों शोरों पर  है तो छोटे से छोटा आदमी भी अपनी लड़की को शिक्षित कर देता है।
लेकिन यहां पर बात अपने विचारों को व्यक्त करने की है अपनी इच्छा अनुसार जिंदगी व्यतीत करने की है अपनी इच्छा अनुसार निर्णय लेने की है , जो स्त्री को बिल्कुल स्वतंत्रता नहीं दी जाती है।
 तर्क क्या दिया जाता है कि  उसे समझ नहीं है उसे अपने निर्णय लेने की क्षमता नहीं है वह अभी समाज से रूबरू नहीं है। अरे चमन बेवकूफ तू ज्यादा होशियार है तेरी निर्णय लेने की क्षमता ज्यादा विकसित है। चाहे पग पग पर धक्के खाता हो।
 लड़की चाहे कितना भी पढ़ लिख ले चाहे कितनी भी बड़ी नौकरी कर ले लेकिन जब शादी की बात आती है तो भाई निकल कर आते हैं बाप निकल कर आते हैं हम लेंगे  निर्णय। हम चुनेंगे दुल्हा उसे अभी समझ भी क्या है और विरोध करने पर तर्क देते हैं कि अगर उसने कोई गलती कर ली तो क्या होगा अगर कुछ नहीं कोई गलत जीवनसाथी सुन लिया फिर फिर तो बहुत थू थू हो जाएगी समाज में।। 
  तुम्हें कैसे भरोसा है कि तुम जो निर्णय लोगे वह सही होगा क्या तुमने आज तक अपने जीवन में जो अपने लिए निर्णय लिए हैं वे सब सही हैं। अरे स्वतंत्रता दो उसे उसके अपने निर्णय खुद लेने दो। गलती करने दो। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा गलती करेगी।करने दो। क्या तुमने कभी गलती नहीं की गलती करना हर व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है गलती से ही व्यक्ति सीखता है।
 
धन्यवाद
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