झुककर रहना हनुमान जी से सीखें।


जब जब श्री राम का नाम लिया जाता है तो उनके साथ उनके वीर भक्त हनुमान जी का नाम भी लिया जाता है भगवान श्री राम के भक्तों में से हनुमान जी से एक है

 हनुमान जी श्री राम के परम भक्त हैं ,हनुमान जी भगवान श्री राम जी के अत्यंत प्यारे हैं।

भगवान राम कहते हैं कि हनुमानजी उन्हें  भारत से भी अधिक प्यारे हैं ।

हनुमान जी के बल बुद्धि और विद्या से तो आप लोग भलीभांति परिचित होंगे लेकिन आप लोगों को यह पता होना चाहिए कि आज के जमाने में या उस जमाने की भी बात करें तो आदमी के पास थोड़ी सी भी ताकत आ जाती थी तो उसे घमंड हो जाता था और जो कि हनुमान जी के ऊपर तो भगवान श्रीराम का हाथ था लेकिन उन्हें कभी घमंड नहीं हुआ वह हमेशा झुककर चलते थे अर्थात उन्हें कभी अपने बल का घमंड नहीं हुआ है।

 ऐसे उन्होंने बहुत से उदाहरण हम लोगों के सामने पेश किए हैं कि उन्हें के पास अत्यंत बल है जब समुद्र पार कर सीता माता को खोजने के लिए लंका जाने का समय आया तो सारे  बंदर एक दूसरे का मुंह देखने लगी किसी में इतना साहस नहीं था कि वे 100 योजन का समुद्र पार कर लंका में जा सके ।

 कोई कहता मैं  60 योजन जा सकता हूं लेकिन समुद्र  सौ योजन है मैं पार नहीं कर सकता।

 कोई कहता मैं 80 योजन जा सकता हूं लेकिन समुद्र तो 100 योजन है मैं पार नहीं कर सकता।

 इ़स तरह सारे लोग बहाने बनाने  लगे और यह वास्तव में समुद्र पार जिसको करना था अर्थात हनुमान जी वह बिल्कुल नहीं बोल रहे थे वे चुपचाप एक जगह बैठे हुए विचार कर रहे थे जब जामवंत ने उन्हें प्रोत्साहित किया और उन्हें उनका बल याद दिलाया और उन्हें राम की सौगंध दी ।

तो बे जाने के लिए तैयार हो गएजब हनुमान जी समुद्र तट से लंका के लिए प्रस्थान कर रहे थे तो उन्होंने सारी  वानर सेना से  वही समुद्र के किनारे उनके वापस लौटने तक इंतजार करने के लिए कहा और कहा कि जब वह वापस लौट आए ।तो साथ में  भगवान राम के पास सीता माता के पता लगने की खबर सुनाने के लिए चलेंगे अगर वह चाहते तो वह सीता माता का पता लगाने का श्रेय अकेले ले लेते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं कियाााा ।

उन्होंने सीता माता का पता लगाने का श्रेय अपने सारे मित्रों को दिया इससे उनकी उदारता का पता चलता है  और जब वे लंका में पहुंच गए थे तो उन्होंने ने  सीता माता को जब उन्होंने अपना परिचय दिया था तो उन्होंने एक दोहा पड़ा था ।

"रामदूत में मात जानकी,सत्य सपथ करुणानिधान की"

 यहां पर उन्होंने अपने आप को केवल राम का दूत बताया उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया अगर उनकी जगह हम या आप होते तो कहते कि अरे मैं यह हूं मैं वह हूं ।मैं सौ योजन समुद्र पार करके आया हूं ।

उन्होंने बिल्कुल कुछ नहीं कहा और शांत भाव से कहा कि मैं तो राम का एक तुच्छ सेवक हूं ।और जब माँ ने  पूछा कि तुमने इतना बड़ा समुद्र पार कैसे किया तो उन्होंने शांति से कहा माता इसमें मेरी कोई तारीफ की बात नहीं है वह तो भगवान श्री राम की लीला है अगर वह जिसके ऊपर अपना हाथ रख दे तो उसकी जिंदगी बदल जाती है अगर वह एक छोटे से सर्प के बच्चे के ऊपर अपना हाथ रख दे तो वहसर्प का बच्चा गरुड़ को अपना आहार बना सकता है मैं तो एक तुच्छ सा वानर हूं जिस पर मेरे प्रभु राम की कृपा हो गई है बस मां  इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं हूं।

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